देव :एक फ़क़ीर...!

देव :एक फ़क़ीर...!
चलो दिल को छूलें...

सोमवार, 12 सितंबर 2011

अकेले


हम यहाँ अकेले क्यों रहते हैं दादी हमारे साथ क्यों नहीं रहतीं ?
बेटे ! हम बड़े अफसर हो गए हैं ना इस लिए.... और फिर बेटा! वो अब बूढ़ी भी हो चली हैं ,
हमें जब कोई  "बेटा"  कहकर बुलाता है तो बहुत अच्छा लगता है.....
आपको अच्छा नहीं लगता क्या?

चोरी


माँ चाहे कम पैसा मिले मान जाना
देर तक रुकने की शर्त मान जाना
जब तुम शादियों में रोटी बनाने जाती हो
बहुत अच्छा लगता है
इस बार फिर से वो काजूवाली बर्फी जरूर चुरा के लाना

शनिवार, 10 सितंबर 2011

खुशी ....

सूर्य की लाली फैलते ही उस दिन मोबाईल बज उठा ।
माँ मैं आ रहा हूं--
तू आ रहा है ---एक पल को दिवाली सी रौनक उसके मुख पर छा गई ।